दो साल की बदहाली के बाद भी अधूरी राहत सत्ता–विपक्ष दोनों ताकतवर, फिर भी अफरीद की सड़क लाचार — सवालों के घेरे में नेता


अफरीद पहुंच मार्ग केवल आधा बनेगा
ओपी राठौर /अफरीद ...बिर्रा–चांपा मुख्य मार्ग से जुड़ने वाला अफरीद पहुंच मार्ग बीते दो वर्षों से बदहाली का दंश झेल रहा है। गड्ढों से भरी यह सड़क स्कूली बच्चों, बुजुर्गों और रोज़ाना आवागमन करने वालों के लिए खतरा बनी हुई है। अब जब मरम्मत की खबर आई है, तो वह भी आधी सड़क तक सीमित—बाकी हिस्सा एक बार फिर भगवान भरोसे छोड़ दिया गया है।
गांव में चर्चा है कि अफरीद के भाजपा और कांग्रेस—दोनों ही दलों के नेताओं की राजनीतिक पकड़ मजबूत है। सत्तापक्ष के नेता सीधे मुख्यमंत्री से जुड़े हैं, तो वहीं नेता प्रतिपक्ष के करीबी भी गांव में मौजूद हैं। इसके बावजूद महज दो किलोमीटर की सड़क पूरी नहीं बन पा रही—यह सवाल गांव के हर चौक-चौराहे पर तैर रहा है।
कांग्रेस सरकार के समय सड़क के चौड़ीकरण और नवीनीकरण की स्वीकृति की बातें हुईं, लेकिन सरकार बदली, और सड़क की किस्मत नहीं। नतीजा—छात्र रोज़ जोखिम उठाकर स्कूल जाते हैं, राहगीर छोटी-बड़ी घटनाओं का शिकार होते हैं, और जिम्मेदार चुप्पी साधे रहते हैं।
अब जानकारी सामने आई है कि विशेष मरम्मत फंड से करीब एक किलोमीटर हिस्से में डामरीकरण होगा—वह भी मुख्य मार्ग से अरविंद इंडस्ट्रीज के आसपास तक। शेष हिस्से में केवल पेचवर्क कर खानापूर्ति की जाएगी। यानी, राहत आधी—परेशानी पूरी।
पीडब्ल्यूडी के सब इंजीनियर का कहना है कि सड़क की दुर्गति को देखते हुए सीमित फंड में इतना ही संभव है। सवाल यह है कि आधे सड़क की स्वीकृति किसने कराई? और पूरी सड़क की जिम्मेदारी कौन लेगा?
डामरीकरण दो-चार दिनों में शुरू होने की बात कही जा रही है। आगे यह देखना दिलचस्प होगा कि श्रेय की होड़ कौन जीतता है, लेकिन गांव आज भी पूछ रहा है—
जब पकड़ इतनी मजबूत है, तो सड़क क्यों कमजोर है?






