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VVPAT वेरिफिकेशन पर सुप्रीम कोर्ट बोला- चुनाव कंट्रोल नहीं कर:क्या शक के आधार पर फैसला सुना दें, डेटा के लिए EC पर भरोसा करना होगा

इलेक्ट्रॉनिक वोटिंग मशीन (EVM) के वोटों और वोटर वेरिफिएबल पेपर ऑडिट ट्रेल (VVPAT) पर्चियों की 100% क्रॉस-चेकिंग की मांग पर सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई शुरू हो गई है। सुप्रीम कोर्ट ने चुनाव आयोग के अधिकारी को बुलाया है। अदालत EVMs की कार्यप्रणाली को लेकर कुछ सवाल पूछना चाहती है।

18 अप्रैल को जस्टिस संजीव खन्ना और जस्टिस दीपांकर दत्ता की बेंच ने 5 घंटे वकीलों और चुनाव आयोग की दलीलें सुनने के बाद फैसला सुरक्षित रखा था।

सुप्रीम कोर्ट ने पूछा था- क्या वोटर्स को पर्ची नहीं दी जा सकती?

1. हमें तथ्यात्मक रूप से सही होना चाहिए। एक बात कि माइक्रो कंट्रोलर वीवीपैट में इंस्टॉल है या फिर कंट्रोलिंग यूनिट में? हमें बताया गया कि ये कंट्रोल यूनिट में हैं। यह भी कि वीवीपैट में फ्लैश मेमोरी है?

2. हम जानना चाहते हैं वो ये कि जो माइक्रो कंट्रोलर इन्स्टॉल है, क्या उसे सिर्फ एक बार प्रोग्राम किया जा सकता है?

3. आपने सिंबल लोडिंग यूनिट का जिक्र किया था, ये कितनी संख्या में मौजूद हैं?

4. हमें बताया गया कि इलेक्शन पिटिशन की सीमा 30 दिन की है और डेटा 45 दिन के लिए स्टोर होता है। कानून के मुताबिक, सीमा 45 दिन की है और इसलिए डेटा स्टोरेज का वक्त भी बढ़ाया जाना चाहिए?

5. क्या कंट्रोल यूनिट ही सील की जाती है या फिर वीवीपैट को भी अलग रखा जाता है? याचिकाकर्ताओं की तरफ से एडवोकेट प्रशांत भूषण, गोपाल शंकरनारायण और संजय हेगड़े ने पैरवी की। प्रशांत भूषण एसोसिएशन ऑफ डेमोक्रेटिक रिफॉर्म्स (ADR) की तरफ से पेश हुए। चुनाव आयोग की ओर से एडवोकेट मनिंदर सिंह और केंद्र सरकार की ओर सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता मौजूद थे। पिछली सुनवाई में कोर्ट ने चुनाव आयोग से पूछा था कि क्या वोटिंग के बाद वोटर्स को VVPAT से निकली पर्ची नहीं दी जा सकती है। इस पर चुनाव आयोग ने कहा- वोटर्स को VVPAT स्लिप देने में बहुत बड़ा रिस्क है। इससे वोट की गोपनीयता से समझौता होगा और बूथ के बाहर इसका दुरुपयोग किया जा सकता है। इसका इस्तेमाल दूसरे लोग कैसे कर सकते हैं, हम नहीं कह सकते।

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