आधी रात तंत्र-मंत्र नहीं, गांव की सदियों पुरानी परंपरा; बैगा ने बांधी कचांदुर की सीमा, 24 घंटे घरों से बाहर निकलने पर रोक

दुर्ग। आधुनिक दौर में जहां गांव तेजी से बदल रहे हैं, वहीं छत्तीसगढ़ के दुर्ग जिले में आज भी एक ऐसी पारंपरिक मान्यता पूरी आस्था के साथ निभाई जा रही है, जिसे सुनकर लोग हैरान हो सकते हैं। ग्राम कचांदुर में हर साल सावन से पहले ‘सवनाही’ यानी गांव बांधने की परंपरा निभाई जाती है। आधी रात को बैगा, बुजुर्ग और ग्रामीण शीतला माता मंदिर में पूजा करते हैं और इसके बाद गांव की चारों दिशाओं में जाकर सीमा बांधने की रस्म पूरी की जाती है।
आधी रात शीतला माता मंदिर में जुटे ग्रामीण
रात करीब 12 बजे जब पूरा गांव नींद में था, उस समय शीतला माता मंदिर में बैगा, बुजुर्ग और ग्रामीण पूजा के लिए एकत्र हुए। पूजा-अर्चना के बाद नारियल और पूजन सामग्री लेकर ग्रामीण गांव की चारों दिशाओं की ओर रवाना हुए।
इस दौरान गांव के अन्य लोग अपने घरों के भीतर ही रहे। ग्रामीणों के मुताबिक, गांव बांधे जाने के बाद करीब 24 घंटे तक लोगों के बाहर निकलने पर रोक रहती है। कोटवार के हांका लगाने के बाद ग्रामीणों को गांव बांधे जाने की सूचना मिलती है।
घरों की दीवारों पर बनाए जाते हैं गोबर के निशान
सवनाही की इस परंपरा के दौरान घरों की बाहरी दीवारों पर गोबर से विशेष निशान बनाए जाते हैं। ग्रामीण इसे गांव की सुरक्षा और देवी-देवताओं की कृपा से जोड़कर देखते हैं।
मान्यता है कि इस पूजा के जरिए गांव में बीमारी, महामारी और प्राकृतिक आपदा से सुरक्षा बनी रहती है और देवी-देवताओं का आशीर्वाद गांव पर बना रहता है।
चारों दिशाओं में की जाती है पूजा
ग्राम पंचायत कचांदुर के सरपंच कीर्तन साहू के अनुसार, गांव बांधने की परंपरा सावन शुरू होने से पहले शनिवार और रविवार की आधी रात को शुरू होती है। सबसे पहले शीतला माता मंदिर में पूजा-अर्चना की जाती है।
इसके बाद बैगा गांव के बुजुर्गों के साथ गांव की चारों दिशाओं में पहुंचते हैं। वहां छोटे-छोटे गड्ढे खोदकर नारियल, चावल, अगरबत्ती और अन्य पूजन सामग्री अर्पित की जाती है। गांव की सीमा और देवी-देवताओं से जुड़े स्थानों पर भी विधि-विधान से पूजा की जाती है।
महिलाएं पूजा में नहीं होतीं शामिल
ग्रामीणों के अनुसार, सवनाही की इस पारंपरिक पूजा में महिलाओं के शामिल होने की परंपरा नहीं है। यह रस्म गांव के बैगा, बुजुर्ग और पुरुष ग्रामीण मिलकर पूरी करते हैं।
बीमारी और आपदा से बचाव की मान्यता
ग्रामीणों का कहना है कि यह परंपरा उन्हें उनके पूर्वजों से मिली है और बदलते समय के बावजूद वे इसे पूरी श्रद्धा के साथ निभाते आ रहे हैं। पूजा के पीछे मुख्य उद्देश्य गांव में सुख-शांति, सुरक्षा और खुशहाली की कामना करना है।





