छत्तीसगढ़

हाईकोर्ट का ऐतिहासिक फैसला: शादीशुदा बहन भी अनुकंपा नियुक्ति की हकदार, ‘शादी के बाद मायके से रिश्ता खत्म नहीं होता’

बिलासपुर। छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने अनुकंपा नियुक्ति को लेकर एक महत्वपूर्ण फैसला सुनाते हुए कहा है कि शादीशुदा बहन को केवल वैवाहिक स्थिति के आधार पर अनुकंपा नियुक्ति से वंचित नहीं किया जा सकता। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि शादी के बाद बेटी या बहन का अपने मायके से संबंध समाप्त नहीं होता।

जस्टिस संजय के. अग्रवाल की एकलपीठ ने राज्य सरकार के 19 सितंबर 2019 के आदेश को निरस्त करते हुए मृतक कर्मचारी की विवाहित बहन को नियमानुसार अनुकंपा नियुक्ति देने पर पुनर्विचार करने और चार सप्ताह के भीतर नया आदेश जारी करने के निर्देश दिए हैं।

क्या है पूरा मामला?

बिलासपुर के नेहरू नगर निवासी दुर्गेश मिश्रा जांजगीर-चांपा में जिला लोक अभियोजन अधिकारी के पद पर कार्यरत थे। 13 जून 2018 को सेवा के दौरान उनका निधन हो गया। वे अविवाहित थे।

उनके निधन के बाद उनकी बुजुर्ग मां तारा मिश्रा ने राज्य सरकार की वर्ष 2013 की अनुकंपा नियुक्ति नीति के तहत अपनी बेटी अमिता दुबे (मृतक की बहन) को अनुकंपा नियुक्ति देने के लिए आवेदन किया।

सरकार ने क्यों खारिज किया था आवेदन?

गृह एवं सामान्य प्रशासन विभाग ने 19 सितंबर 2019 को यह कहते हुए आवेदन अस्वीकार कर दिया कि अनुकंपा नियुक्ति नीति में विवाहित बहन को नौकरी देने का स्पष्ट प्रावधान नहीं है।

इसके बाद इस आदेश को हाईकोर्ट में चुनौती दी गई।

हाईकोर्ट ने क्या कहा?

याचिकाकर्ता की ओर से सुप्रीम कोर्ट के विभिन्न फैसलों का हवाला देते हुए कहा गया कि केवल विवाह हो जाने से बेटी या बहन अपने मूल परिवार से अलग नहीं हो जाती।

हाईकोर्ट ने भी इस तर्क को स्वीकार करते हुए कहा कि अनुकंपा नियुक्ति का उद्देश्य मृतक कर्मचारी के परिवार को आर्थिक संकट से उबारना है। इसलिए आर्थिक निर्भरता और वास्तविक आवश्यकता महत्वपूर्ण है, न कि आवेदक का विवाहित या अविवाहित होना।

कोर्ट ने यह भी कहा कि वर्तमान समय में अनेक शादीशुदा बेटियां और बहनें अपने माता-पिता एवं मायके के परिवार की आर्थिक जिम्मेदारी निभाती हैं। ऐसे में केवल विवाह के आधार पर उन्हें अनुकंपा नियुक्ति से वंचित करना संविधान के अनुच्छेद 14 (समानता का अधिकार) और अनुच्छेद 15(1) (भेदभाव निषेध) की भावना के विपरीत है।

चार सप्ताह में नया आदेश देने के निर्देश

हाईकोर्ट ने राज्य सरकार के वर्ष 2019 के आदेश को निरस्त करते हुए संबंधित अधिकारियों को निर्देश दिया है कि चार सप्ताह के भीतर मामले पर नियमों के अनुसार पुनर्विचार कर नया और सकारात्मक आदेश जारी करें।

फैसले का व्यापक प्रभाव

कानूनी जानकारों के अनुसार, यह फैसला भविष्य में उन मामलों के लिए महत्वपूर्ण मिसाल बन सकता है, जहां केवल शादीशुदा होने के आधार पर बेटियों या बहनों को अनुकंपा नियुक्ति से वंचित किया जाता रहा है।

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