“ना डिग्री, ना प्रशिक्षण… फिर भी पत्रकार!” — व्यवस्था पर बड़ा सवाल.. पत्रकार ओपी राठौर की विशेष टिप्पणी

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“पत्रकारिता देश का चौथा स्तंभ है” — यह केवल एक पंक्ति नहीं, बल्कि लोकतंत्र की आत्मा मानी जाती है। जब आम आदमी सरकारी दफ्तरों, भ्रष्ट व्यवस्था या सामाजिक अन्याय से पीड़ित होता है, तब उसे सबसे पहले मीडिया और पत्रकार से ही उम्मीद रहती है। लेकिन वर्तमान समय में यही पवित्र पेशा गंभीर चुनौती और अव्यवस्था के दौर से गुजर रहा है।
आज सोशल मीडिया और वेब पोर्टल की बाढ़ ने इस पेशे की गरिमा को धूमिल कर दिया है। गांव-गांव में बिना प्रशिक्षण, बिना नैतिकता और बिना किसी तय मापदंड के लोग खुद को पत्रकार घोषित कर रहे हैं।
“पत्रकारिता अब मिशन नहीं, कई लोगों के लिए केवल साधन बन गई”
आज स्थिति यह है कि कोई भी व्यक्ति मोबाइल उठाकर यूट्यूब चैनल बना रहा है और खुद को पत्रकार बताने लग रहा है। न पत्रकारिता की पढ़ाई, न सामाजिक जिम्मेदारी, न तथ्य जांच — केवल वायरल होने की होड़। इससे वास्तविक और जिम्मेदार पत्रकारों की मेहनत पर भी सवाल उठने लगे हैं।
शिक्षक बनने के लिए डीएड, बीएड, TET जैसी परीक्षाएं अनिवार्य हैं। इंजीनियर, लाइनमैन, आईएएस और आईपीएस बनने के लिए योग्यता और चयन प्रक्रिया तय है, लेकिन पत्रकारिता में कोई स्पष्ट व्यवस्था नहीं होने से यह पेशा अव्यवस्थित होता जा रहा है।
“विज्ञापन दो और बन जाओ ब्यूरो चीफ”
कई रजिस्टर्ड अखबार और पोर्टल केवल विज्ञापन के आधार पर लोगों को जिला ब्यूरो चीफ और संवाददाता बना रहे हैं। चाहे व्यक्ति 8वीं पास हो, 10वीं या 12वीं — कोई अनुभव न होने के बावजूद उसे पत्रकार की पहचान मिल जाती है। इससे पत्रकारिता की गंभीरता और विश्वसनीयता दोनों प्रभावित हो रही हैं।
पत्रकारिता की पढ़ाई करने वाले युवाओं में बढ़ रही निराशा
पत्रकारिता और जनसंचार की पढ़ाई करने वाले छात्र-छात्राओं का कहना है कि वर्षों की पढ़ाई और प्रशिक्षण के बाद भी उन्हें वही पहचान नहीं मिल पाती, जो बिना किसी योग्यता के सोशल मीडिया आधारित तथाकथित पत्रकारों को मिल रही है।
राजनीतिक चापलूसी बनाम निष्पक्ष पत्रकारिता
आज कई लोग पत्रकारिता का उपयोग जनहित के बजाय राजनीतिक दलों की चापलूसी और व्यक्तिगत लाभ के लिए कर रहे हैं। तीखे शीर्षक, भ्रामक वीडियो और सनसनीखेज कंटेंट के माध्यम से समाज में भ्रम फैलाया जा रहा है।
जरूरत पत्रकारिता में नियम और जवाबदेही की
विशेषज्ञों का मानना है कि डिजिटल मीडिया और वेब पोर्टल के लिए भी स्पष्ट नियम, प्रशिक्षण और जवाबदेही तय होना जरूरी है, ताकि वास्तविक पत्रकारिता सुरक्षित रह सके और समाज का भरोसा बना रहे।
पत्रकारिता केवल कैमरा और माइक नहीं, बल्कि जिम्मेदारी, सत्य और जनहित का धर्म है।





