बरसात से पहले बनी सड़क, पहली बारिश में उड़े चिथड़े!
अरविंद इंडस्ट्रीज से सब-स्टेशन तक एक किलोमीटर सड़क छह महीने भी नहीं टिक सकी, निर्माण गुणवत्ता और पीडब्ल्यूडी की निरीक्षण प्रणाली पर उठे सवाल*

अफरीद/ग्राम अफरीद की बदहाल पहुंच मार्ग को लेकर ग्रामीणों की लंबे समय से चली आ रही मांग के बाद आखिरकार अरविंद इंडस्ट्रीज से सब-स्टेशन तक करीब एक किलोमीटर सड़क का निर्माण लगभग 60 लाख रुपये की लागत से कराया गया। ग्रामीणों को उम्मीद थी कि नई सड़क से आवागमन की समस्या दूर होगी, लेकिन बरसात की पहली ही मार में सड़क की निर्माण गुणवत्ता पर सवाल खड़े हो गए हैं।
बताया जा रहा है कि सड़क का निर्माण इसी साल मार्च के आसपास कराया गया था। लेकिन कुछ ही महीनों बाद सड़क कई जगहों से उखड़ने और क्षतिग्रस्त होने लगी है। सड़क की यह हालत देखकर ग्रामीणों में नाराजगी है। उनका कहना है कि जब लाखों रुपये खर्च कर सड़क बनाई गई थी तो वह कम से कम कुछ वर्षों तक टिकने लायक होनी चाहिए थी।
छह महीने भी नहीं चली सड़क, जिम्मेदार कौन?
ग्रामीणों का सवाल है कि यदि सड़क निर्माण में निर्धारित मापदंडों और गुणवत्ता का पालन किया गया था तो पहली बरसात में ही सड़क की परत क्यों उखड़ने लगी? क्या निर्माण के दौरान सामग्री और सड़क की मोटाई की सही जांच की गई थी? निर्माण पूर्ण होने के बाद विभागीय अधिकारियों ने सड़क का निरीक्षण किस आधार पर स्वीकृत किया?
पीडब्ल्यूडी की निरीक्षण व्यवस्था पर सवाल
सड़क की मौजूदा स्थिति ने लोक निर्माण विभाग की गुणवत्ता जांच और निरीक्षण प्रणाली पर भी सवाल खड़े कर दिए हैं। ग्रामीण मांग कर रहे हैं कि सड़क निर्माण की तकनीकी जांच कराई जाए और यदि निर्माण में गुणवत्ता संबंधी खामी पाई जाती है तो संबंधित ठेकेदार के विरुद्ध नियमानुसार कार्रवाई की जाए।
ग्रामीणों का कहना है कि सरकारी धन से होने वाले विकास कार्यों में यदि गुणवत्ता की अनदेखी हुई तो इसका सीधा नुकसान जनता को उठाना पड़ता है। सड़क खराब होने के बाद दोबारा मरम्मत के नाम पर फिर सरकारी राशि खर्च होने की स्थिति बन सकती है।
*ग्रामीणों की मांग—जांच हो, जिम्मेदारी तय हो*
अफरीद के ग्रामीणों का कहना है कि इस सड़क के लिए लंबे समय से मांग की जा रही थी। काफी इंतजार के बाद सड़क बनी, लेकिन वह भी कुछ ही महीनों में खराब होने लगी। ग्रामीणों ने सड़क की तकनीकी जांच, गुणवत्ता परीक्षण और निर्माण कार्य की निष्पक्ष जांच की मांग की है।
अब देखने वाली बात यह होगी कि संबंधित विभाग सड़क की वास्तविक स्थिति का निरीक्षण कर जिम्मेदारी तय करता है या फिर लाखों रुपये की लागत से हुए इस निर्माण की खामियां बरसात के पानी के साथ ही बह जाती हैं।
ग्रामीणों का सीधा सवाल है—60 लाख रुपये की सड़क छह महीने भी नहीं चली, तो आखिर सरकारी धन की जवाबदेही किसकी है?





